उम्र तमाम नाकाम रहा ।

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

हर दाव पै किस्मत आजमाता रहा ,

हर बार हार कर पछ्ताता रहा

हारा हुआ जुआरी बदनाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

अब-अब कह- कह उम्मीद बँधी थी ।

किस्म्त मे जंजीर बँधी थी ।

भारी मेरे ह्ल्के मन पर,

हार का ईल्जाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

सफलता आ-आ छू कर निकल गई

बँधी मुटठी से जैसे रेत निकल गई

मिला क्या ? कुछ नही

पाने का बस नाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

ख्वाबो मे अरमानो का महल बना था

मैने लक्ष्य जरा ॐचा रखा था

एक सिढी भी नसीब ना हुई

ऐसा मेरा मकाम रहा ।

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

अंधेपन का होने लगा आभास मुझे

इतना मन मे अंधकार भरा था

उम्मीद भरे जीव्न मे मेरे

सुबह को भी शाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

सौ राह मिले हर राह मे

बस दौड्ता रहा, कही पहुचा नही

था दौड भाग का जीवन

एक पल भी ना विश्राम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

शान मे था सर ॐचा उठाये

जब तक सपनो मे था खुद को डुबाये

और हकीकत मे सिर को झुकाये

करता सदा सबको सलाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

शराफत से थी पहचान मेरी

ईमान और र्धम से था सम्मान बना

भोला-भोला कह कर लूटा सबने,

यही मेरा ईनाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

कही पडा हूँ ठोकर खाता

जिसने लूटा वही पह्चान ना पाता

आवारा, अजनबी,लावारिश कहते

ऐसा मेरा अंजाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

दुःख मे मेरा एक ही था साथी

मेरा लिये तो सबसे अच्छा था वो पाशी

गम मे साथ मेरे उसी का झुठा जाम रहा

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

अंधेरे मे जनमा रौशन

अंधेरे मे अवसान हुआ

अंधो की दुनिया मे देखो भाई

रौशन का क्या दाम रहा ।

उम्र तमाम नाकाम रहा ।

3 Comments

  1. Sri Prakash Dimri 03/10/2012
  2. sangeeta swarup 03/10/2012
  3. anand 21/05/2013

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