कवीता/ निष्कर्ष

 

आज सुबह जब आंख खुली
चन्द शब्द सिराहने बैठे थे ।
हौले – धीरे जुडने लगे
जैसे बनी हो, कोई गीत माला ।
कोई ढलना चाहता था कवीता में,
किसी का अलाप था निराला ।
वो ठंडी मस्त हवा
गिरा गई कुछ पन्ने जमीन पर,
मेज पर पडी कलम भी फडफडाने लगी ।
जैसे वो कर रही हो इशारा
तू उठा कलम, शब ढलने लगी ।
सजा मेहफिल ख्यालों की
मैं लिखने लगी , मैं गाने लगी ।

2 Comments

  1. Yashwant Mathur 03/10/2012
  2. Manisha 27/02/2014

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