कविता का भूत

कवि बनने के लिए कविता लिखना पङता है

दुःख में भी दिखावटी खिलखिलाना पङता है

मैनें भी कवि बनने के लिए कई पापङ बेले

अपनी श्रीमतीजी के कई बेलन बङी शान से झेले

कई बेलन झेले फिर भी हुआ न असर

लगता है बेलन की मार में कहीं रह गई कसर

छोङो बेलन को बात श्रोताओं की करें

बेचारे श्रोता जियें या बिन पानी डूब मरें

भूल-भरोसे भी सुनले यदि कविता मेरी

उनके घर में छिङ जाती है रणभेरी

सब्जी मण्डी के श्रोताओं को भी मैंनें आजमाकर देखे

इन्होंनें तो टमाटर की बजाय कोरे बैंगन फैंके

ले गया बैंगन घर सब्जी बनाने के लिए

मिसेज कवि ने उठाया बेलन मेरा भुर्ता बनाने के लिए

एक बार तो घोर संकट था पङ सकते थे जूत

इस तरह उतर गया अपनी कविता का भूत 

 

-“गोपी”

5 Comments

  1. Yashwant Mathur 03/10/2012
  2. kavita rawat 03/10/2012
  3. Madan Saxena 05/10/2012
  4. Madan Saxena 05/10/2012
  5. ashish 02/01/2013

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