मर गया मेरा मन |

मर गया मेरा मन |

हाल-फ़िलहाल,
न जाने कियों,?
अंतर्मन के बिचारों को,
मन की जमी मे बोया था,
सोचा था……….,
सुन्दर सा कोई गीत,
गजल, शयरी या कविता,
हंसी का कोई तराना,
अंकुरित होगा फूलों सा,
ख्वाइस थी………,
महकेगा चित्तवन,
फैलेगी सुगंध,
चहकेंगे हर छंद,
शीतल शोभित बर्णन,
पर कठोर कुंठित मन से,
उपजा हैं काँटों का उपवन |
ह्रदय को करके लहू-लुहान,
तार-तार हो गये,
सहनशीलता के आधार,
मुझे अब अच्छे लगते विरह के गीत,
दर्द भरें शेर और शायरी,
गजल जिस मे हो बिढ़म्बना,
किसी के छलकते नयन |
समभाव से मन मे आता चैन,
हँसते-गुनगुनाते लोग करते बेचैन,
सब कहते……..,
मर गया मेरा मन |
मरे हुवे मन की चित्ता की राख़,
सारे शरीर पर मलकर,
मैं “अघोरी” सा……
फिरता यादों के शमशान पर |
हाल-फ़िलहाल,
न जाने कियों ,?
अंतर्मन के बिचारों को,
बंजर खेत मे सीच रहा हूँ,
बात-बेबात !

:-सजन कुमार मुरारका

Leave a Reply