बूढ़ा पेढ़

मेरी तो उम्र हो चुकी
वर्षों से यहाँ खड़ा हूँ
कई सावन झेल चुका
शीत को निहार ता रहा
मौसम के सारे उतार चड़ाव भी देखे
तपती धूप सहकर छाया बिछाता रहा
कितने राही मेरी छाया में बैठ
थकान अपनी उतारते रहे
समय अब बदल गया है
ठण्ड मुझे अब लगने लगी
चहरे पर जो मेरे शबाब था
अब खत्म हो चुका
जो भी थोड़ी मुरझाई पत्तियाँ
मेरी बाहों में बची थीं
एक हवा के झोके ने तन से मेरे उतार लीं
अब तो बरखा भी मुझे गीली गीली लगती है
सूरज का ताप मेरे तन को जलाता है
मेरी तो उम्र हो चुकी
वर्षों से यहाँ खड़ा हूँ
कई सावन झेल चुका
शीत को निहार ता रहा
मौसम के सारे उतार चड़ाव भी देखे
तपती धूप सहकर छाया बिछाता रहा
कितने राही मेरी छाया में बैठ
थकान अपनी उतार ते रहे
समय अब बदल गया है
ठण्ड मुझे अब लगने लगी
चहरे पर जो मेरे शबाब था
अब खत्म हो चुका
जो भी थोड़ी मुरझाई पत्तियाँ
मेरी बाहों में बची थीं
एक हवा के झोके ने तन से मेरे उतार लीं
अब तो बरखा भी मुझे गीली गीली लगती है
सूरज का तेज मुझे और सुखाता है
तन को मेरे जलाता है
अब में जान रहा हूँ में बूढ़ा हो गया
सर्दी मुझे लगने लगी
गर्मी से घबराहट होती है
बस अब तो चाह है मेरी
मुझे यहाँ से हट जाना है
वक्त के साथ में जमीं से अलग हो जाना है
फिर मेरे तन को इंसानी दुनिया में
कुछ प्राणी की सेवा में
अपना जीवन बिताना है
कुछ आग में जल
राख बन माटी में मिल जाना है
ज मुझे और सुखाता है
तन को मेरे जलाता है
अब में जान रहा हूँ में बूढ़ा हो गया
सर्दी मुझे लगने लगी
गर्मी से घबराहट होती है
बस अब तो चाह है मेरी
मुझे यहाँ से हट जाना है
वक्त के साथ में जमीं से अलग हो जाना है
फिर मेरे तन को इंसानी दुनिया में
कुछ प्राणी की सेवा में
अपना जीवन बिताना है
कुछ आग में जल
राख बन माटी में मिल जाना है

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