शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर जरुरत है

नज़्म “शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर ज़रूरत है ||”

 

अजब छाई हुई अहले वतन पर आज गफ़लत है |

हवालों और घुटालों से इन्हें मिलती न फुर्सत है ||

न इनको है कोई परवाह वतन मादर की अस्मत की |

शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर ज़रूरत है ||

                             कभी मज़हब और मिल्लत पर भिड़ा करते हें शोहरत है |

                             अहिंसा धर्म है इनका लड़ा करते हैं हैरत है ||

                             न इनको याद है ज़िल्लत वो रुसवाई गुलामी की |

                             शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर ज़रूरत है ||

सभी ज़ुल्मो सितम सहना पुरानी इनकी आदत है |

जिधर देखो उधर फैली यहाँ पर आज दहशत है ||

तुम्हारी याद ऐसे में हमें शिद्दत से है आती |

शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर ज़रूरत है ||

तुम्हारे नाम से मिलती जहां में इनको इज्ज़त है |

तुम्हारी सरफरोशी ने ही बख्शी इनको अज़मत है ||

मिटाना है तुम्हें अब इनमें बढ़ते इख्तिलाफों को |

शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर ज़रूरत है ||

दिलाई थी जो आज़ादी उसी की आज बरकत है |

इन्हें अशफ़ाक बिस्मिल की न अब तो याद उल्फ़त है ||

दुहाई दे रहा रहबर तुम्हें कब से यकीन जानो |

शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर ज़रूरत है ||

………………………………….-आले हसन खान”रह्बर कायमगन्ज”………..

 

5 Comments

  1. Mahendra Kewaliya 14/04/2015
  2. Sharad Bhardwaj Sharad Bhardwaj 14/04/2015
  3. देव व्रत शुक्ल 25/05/2016

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