तुझे खरीद सकूँ मेरी औकात कहाँ……

ख्व़ाब तो हैं मगर तस्सुरात कहाँ ,
कुछ कर सकूँ मैं ऐसे हालात कहाँ ,

तेरी कीमत बहुत है इश्क़-ए-बाज़ार में ,
तुझे खरीद सकूँ मेरी औकात कहाँ ,

आना न आना तो उसकी मर्ज़ी है ,
अब ये बड़ा फैसला हमारे हाथ कहाँ ,

नमी चाहिए तो आसमां को पहुँच ,
ज़मीन-ए-नाचीज़ पे अब बरसात कहाँ ,

बचना है यहाँ दुश्मनों से हमेशा ,
न जाने लगाएं हों कब घात कहाँ ,

अदा है हया है नज़ाकत भी है तुझमे
सब है मगर दिल लगी की बात कहाँ ,

मिल जाएगा खुदा अपने ही दिल में ,
बियाबान में ढूंढता है उसकी ज़ात कहाँ !!

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