कैसी महफ़िल है….

कैसी महफ़िल है कोई इन्तेज़ाम नहीं है ,
किसी के भी हाथों में जाम नहीं है ,

चन्द लम्हें को सही वो पास बैठे ,
क्या एसा भी कोई इन्तेज़ाम नहीं है ,

तुझे भी रोक लेता मैं रात होने तक ,
मेरे बस में लेकिन ये शाम नहीं है ,

पलट के देखा है आज सारे वरक को ,
तेरी किसी किताब में मेरा नाम नहीं है ,

किस किस को दोगे सज़ा-ए-इश्क़ तुम यहाँ ,
सिर्फ मेरे ही सर पे ये इल्ज़ाम नहीं है ,

जब से गया है तू तन्हा छोड़ कर मुझे ,
एक पल को भी चैन-ओ-आराम नहीं है ,

चलते होंगे सब अपने अपने रास्ते पर ,
हम चलते हैं जो रास्ता आम नहीं है ,

सब कहते हैं बहुत दूर जाएगा ‘शादाब’ ,
अभी ये मेरा आखरी कयाम नहीं है !!

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