आज भी kajal sky.. लिखती हूँ मैं….

आज भी  kajal sky.. लिखती हूँ मैं, 

पर अब वो दिल भी नहीं,
 कोई ओर भी नहीं , और तुम भी नहीं..

अब भी तितलियों  को छूने  की नाकाम कोशिश, और पंछियों को देखना,
मैं आज भी दूर खिड़कियों से झाँकती हूँ, पर अब वो नज़र भी नहीं, 
  कोई ओर भी नहीं , और तुम भी नहीं..

आसमाँ को देख ,दुआ  आज भी मैं पाक साफ़ करती हूँ,
पर अब प्राथना में अब कोई ख़्वाहिश भी नहीं, 
 कोई ओर भी नहीं , और तुम भी नहीं..

यूँहीं यादों में खोना, तन्हाईयों  में मुस्कुराना,
मैं आज भी आईने में घन्टों निहारती हूँ, 
पर अब वो अक्स भी नहीं, 
कोई शख्स भी नहीं, और तुम भी नहीं..

गर वक़्त फिर करवट ले , और हसीं दिन लौट आये मेरे, 
तब भी इस दिल में पड़ी दरारों को ,कोई भर सकता भी नहीं,
 कोई ओर भी नहीं , और फिर से तुम भी नहीं..
                                                                              kajal sky….

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