निष्ठुर हवायें

चलना है दूर बहुत, जख्मीं से पाँव हैं,

आस नही दूर तलक बेगाना गाँव है।

धूप से भरे हैं मग, चल रहें अकेले हम,

 पत्थरों के जंगल में, दुर्लभ अब छाँव है।

 भटक रहे परिन्दे, साँझ की इस बेला में,

 नीड़ हुआ विस्मृत-सा, नही ठौर-ठाँव है।

 थक गया है पिंजर यह, चेहरे पर झुर्रियां है,

 आबाद थे ये कभी, उजड़े जो गाँव हैं।

बेगाना मौसम है, निष्ठुर हवायें हैं,

कोयल की कूक नही, कौओं की काँव है।

 जगती के मेले में, गुम हुए हैं रिश्ते सभी,

 अपनों के चेहरे पर अनजाने भाव हैं।

मानवता जख्मी है, संवेदना कराह रही

, हममें अनुभूति नही, पत्थरों में घाव है।

 कौन-सी हवाओं ने, अजब चाल चल दी है,

नदी है उफनाई हुई, कागज की नाव है।

 

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  1. प्रदीप कुमार साहनी 26/09/2012

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