मैं

दीये सा जलता हूँ मैं

हवाओं सा बहता हूँ मैं

 

नफरत सा पैदा होता हूँ

प्यार सा बढ़ता हूँ मैं

 

अपनों की फ़िक्र है मुझे

इसलिए इर्ष्या का पात्र हूँ मैं

 

गरीबों की गरीबी हूँ

अमीरों का अमीरी हूँ मैं

 

पूर्णमासी का चाँद हूँ

अमावस की काली रात हूँ मैं

 

नदियों पे चलता हूँ समुद्र पे लोटता हूँ

बिना तल वाला जहाज हूँ मैं

 

बेपटरी होती मेरी ज़िन्दगी

पटरियों के बीच का दरार हूँ मैं

 

कोई क्या कहेगा बगैर सोचे

चुपचाप खड़ा दीवार हूँ मैं …..

2 Comments

  1. प्रदीप कुमार साहनी 26/09/2012

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