अपनी चीख़ों से बेचैन

अपनी चीख़ों से बेचैन सो न पाया था
तुम्हे इसीलिये मै जगाने आया था

 

बहुत बड़े थे तुम्हारी उम्मीदों के पहाड़

मै प्यार की पाठशाला में नया आया था

 

उम्र-भर भागा फिरा मै जिसके पीछे

वो कोई और नहीं मेरा ही साया था

 

वैसे तो दिल में मेरे हज़ार गम थे

मगर मै होंठ अपने सिल के लाया था

 

ताकती रहती है दरवाज़े पर बूढ़ी आँखें

मै उनका चैन-ओ-सुकूँ ले आया था

 

मुझे भी उस उम्र के पड़ाव में पहुँचना है

मै अपना मुस्तकबिल गाँव में छोड़ आया था

 

ये शहर मेरे मिज़ाज का नहीं नादिर

तुम्हें आखिरी सलाम करने आया था 

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