३७७०. दीवाना हूँ रास मुझे ये दीवानापन आया है

 

३७७०. दीवाना हूँ रास मुझे ये दीवानापन आया है

 

दीवाना हूँ रास मुझे ये दीवानापन आया है

मुझको है परवाह नहीं सबने मुझको ठुकराया है

 

क्या लज़िम है मुझको दिल की या मैं दुनिया की मानूँ

ऐसे ख़्यालों ने अकसर मेरे दिल को भरमाया है

 

जो मुझको पागल कहते मैं उनको आलिम कहता हूँ

इल्म मुबारक उनको, मेरा नासमझी सरमाया है

 

जब दुनिया से जाएंगे सबकी मंज़िल इक सी होगी

फ़र्क अमीर-गरीबों का केवल इंसानी माया है

 

ख़लिश गिला है नहीं किसीसे किस्मत अपनी अपनी है

सिंहासन पर कोई, कोई जंज़ीरों जकड़ाया है.

 

आलिम = इल्म वाला, विद्वान

सरमाया = धन-दौलत, संपत्ति

 

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