तुझे नही….!

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |

उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |

ढूँढता हूँ उस शख्स को, जिसे तूने कभी चाहा था |

अपने वादे न निभा पाया, उस गुनाहगार को ढूँढता हूँ |

 

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |

उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |

ढूँढता हूँ उन लम्हों को, जब करीब थे हम दोनो |

 

ढूँढता हूँ उन लब्जोँ को, जिन्हे उम्मीद थी मुझमें |

जिन पर साथ चले थे, उन राहों को ढूँढता हूँ |

बाँटी थी जो बातेँ, उन बातों को ढूँढता हूँ |

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ | उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |

 

– गौरव संगतानी

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