समझे नहीं जो खामोशी मेरी

समझे नहीं जो खामोशी मेरी,

मेरे लब्जों को क्या समझेंगे |

बचते रहे उम्र भर साये से मेरे,

मेरे जख्मों को क्या समझेंगे |

भूल जाना यूँ तो नहीं है,

रवायत मोहब्बत की |

समझे नहीं जो हालात मेरे,

इन रस्मों को क्या समझेंगे |

 

– गौरव संगतानी

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