जीवन का संदेश


अच्छा  और  बुरा, सुख  और  दुःख  हैं

एक  ही सिक्के  के   दो  पहलू

सच मानो  तो  दोनों  ही  करते  हमें

जीने  और  जानने  को  जिज्ञासु …….

लाभ -हानि, जय -पराजय  तो  हैं

जीवन -रूपी  नदिया  के   दो  अभिन्न  किनारे

तपती  रेत पर जो न  चले   कभी

 वो  क्या  जाने चांदनी  रात  की  अनुपम  शीतलता  प्यारे ……

मेहँदी  को  जब रौंदा जाये

तभी  निखरती  उसकी  लाली

घोर अँधेरी काली न  हो  जब  तक  रात

 क्या  कभी  मतलब  की  होगी  दिवाली ?

रावण और  दुर्योधन  जैसे  कुपात्र  न  होते

तो  फिर  क्या  जरुरत  थी  राम  और  कृष्ण  की

होता जो   न कर्ण  सा  प्रतिद्वंदी

गाथा  न  मिलती  अर्जुन  के  गांडीव  से  निकली  टंकार की …..

हो  न  कभी  मुशिकलों  और  झंझावातों  का  सामना

प्रखर  होगा  कैसे  फिर   मानव  के  अन्दर  सतत  संघर्ष  की  चेतना …..

कुछ  पल  अंधकारों  में  अगर  न  होते

भारतीय  हिंदुत्व  और  रोम की  सभ्यता

उदय  होता  फिर  कैसे

बुद्ध  के  ज्ञान  और  ईसा  मसीह  के  बलिदान  की  रम्यता …..

मोह , छल , कपट  और  अज्ञान  न  होता

अगर  भाई -भाई  के  बिच

मानव जाति को  मिलती  न  फिर

नारायण  से  गीता-ज्ञान   की  सिंच  …..

गर  होता  न  ‘नचिकेता’  निडर

 साहसी,  तत्व-ज्ञानी  बालक   सुजान

संपूर्ण न होता फिर  ‘कठोपनिषद’  में

जीवन -मृत्यु  का  भेद  बखान …..

रहता   न  यदि   विष्णु -भक्त  ‘प्रह्लाद’

मुश्किलों  में  भी  स्थिर -चित्त

क्या  हो  पाता फलित  ‘दशावतारम’  में

भगवान  ‘नरसिंह’  का  कृत …..

धनानंद और सिकंदर मचाये प्रजा में त्राहि

तब आये चाणक्य और यशस्वी  चन्द्रगुप्त  मौर्य

यदि  न  होता  औरंगज़ेब  क्रूर  अत्याचारी

कैसे  सुदृढ़ होता फिर शिवाजी  का  शौर्य …..

हे  नरेन्द्र ! जब  भी  होगा  तू  विचलित   और  भाव -विह्वल

और  उमड़ेगा जब  तेरे  अन्दर  अपार  ‘विवेक’

उसी  क्षण  मिलेगा  तुझे  नीड़-क्षीर  पृथक  करनेवाला  मनोबल

और  अद्वैत सिखाने  वाले   श्रेष्ठ ‘परमहंस’  नेक …..

मनुज है तो, मन से दुःख और मायूसी मिटा ले

अपने ‘इष्ट’ के  नाम से,  स्नायु में हर्ष और प्रज्ञा संचालित  कर ले……

मनुष्य तभी  बनता  धीर -वीर, तेजवान  और  ओज़स्वी

स्थितप्रज्ञ  हो  सुख – दुःख, हार -जीत  को  गले  लगाये  जब  वो  तपस्वी  .….

 

Ramjee Chaudhary (Research Scholar @ IIT Bombay)

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