मैं डूब जाता अगर….

डूबती कश्ती को किनारा , न दिया होता ,
मैं डूब जाता अगर सहारा , न दिया होता ,

जब माहताब को ही रखना था दूर हमसे ,
आसमां को मेरी सितारा , न दिया होता ,

ख्वाब ही बन जाना था हकीकत को जब ,
आँखों को मेरी वो नज़ारा , न दिया होता ,

शद शुक्र है मौला का हमें बख्शी है जिंदगी ,
ईतना भी एहसान खुदारा , न दिया होता ,

जख्म भरने में ज़माने लगते हैं “शादाब” ,
एक ही काफी था दोबारा , न दिया होता !!

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