कभी मुझ गरीब के घर भी आ….

कभी मंजिलों के सफर में आ ,
कभी दिल में मेरे उतर के आ ,

ये एहसान मुझ पे कर कभी ,
कभी मुझ गरीब के घर भी आ ,

माना नहीं तुझे फुर्सत कभी ,
निकाल वख्त इसी पहर में आ ,

शब् -ओ- रोज़ तुझे देखा करूँ ,
कभी ख्वाब बनके नज़र में आ ,

एहसास -ए- खुश्बू महसूस हो ,
कभी फूल बनके शजर में आ ,

बदलें रास्ता खुद तारीकियाँ ,
कभी शम्स बनके सहर में आ ,

मेरी रूह तक भी “शादाब” हो ,
कभी ईस तरह भी असर में आ !!

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