बहुत दिन हुए गुफ्तगू किये हुए….

शाम ढल गई आरजू लिए हुए ,
शब् खड़ी है अन्धेरा किये हुए ,

कब होगी वो मुलाकात अपनी ,
बहुत दिन हुए गुफ्तगू किये हुए ,

न जाने कब वो इधर से गुजरें ,
हाथ में खड़ा हूँ गुलाब लिए हुए ,

उम्मीद है फिर नया मिलेगा ,
वख्त हो गया जख्म सिये हुए ,

मुंतजिर था मैं मुस्कुराहट का ,
वो आया उदास सवेरा लिए हुए ,

बज़्म में तू ही आया है शायद ,
कौन घूमता है खुश्बू लिए हुए ,

तोड़ने के लिए ही सही रख ले ,
कब तक फिरूं दिल लिए हुए !!

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