अच्छा हुआ तेरे हाथ में कुदरत नहीं मिली….

सोचूं कुछ अपने बारे में फुर्सत नहीं मिली ,
उस बेवफा की याद में मोहलत नहीं मिली ,

कितनो का दिल टूटता कितने घर बर्बाद होते ,
अच्छा हुआ तेरे हाथ में कुदरत नहीं मिली ,

हम आईना हो गए सबको देखते देखते ,
जहाँ भर में तुझ सी कोई सूरत नहीं मिली ,

गम में जीने वाला खुश होता है कहाँ ,
आज तक किसी को ऐसी फजीलत नहीं मिली ,

हम भी हो गए बाज़ार-ऐ-ज़ीनत ए “शादाब” ,
दिल बेच तो दिया मगर क़ीमत नहीं मिली !!

Leave a Reply