कदम कदम पे इम्तेहान बहुत था….

वो जा रहा था मैं हैरान बहुत था ,
रोकता कैसे मैं परेशान बहुत था ,

रुक जाता वो अगर मालुम होता ,
मेरे दर्द से वो अनजान बहुत था ,

रास्ता तय कर लेती मंजिल मगर ,
कदम कदम पे इम्तेहान बहुत था ,

क्या क्या ले गया वो मालूम नहीं ,
दामन में मगर सामान बहुत था ,

वख्त ने ही नहीं दिया मौक़ा हमें ,
तेरा तो मुझपे अहसान बहुत था ,

कभी अपने करीब भी बुलाया होता ,
तुझसे मिलना तो आसान बहुत था ,

क्या मिला दिल में घर बना कर ,
रहने के लिए आसमान बहुत था ,

तेरे नाम से मेरा भी नाम हो गया ,
तुझसे पहले मैं गुमनाम बहुत था ,

पूरी कायनात है दस्तयाब मगर ,
तेरे आँचल का अरमान बहुत था ,

एक पल में चकना चूर हो गया ,
शादाब’ को खुद पे गुमान बहुत था !!

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