उर्दू को जरुरत ‘इकबाल-ओ-फराज़’ की है ….

बात लफ़्ज़ों की नहीं उसके अंदाज़ की है ,
जो सबको नहीं मिलता उस एजाज़ की है ,

हमारी औकात कहाँ करें इसकी खिदमत ,
उर्दू को जरुरत ‘इकबाल-ओ-फराज़’ की है !!

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