दीवाना मुझे ये “शादाब” लगता है….

हुस्न ख्याल-ए-माहताब लगता है ,
क्या कहूँ के तू लाजवाब लगता है ,

कैसे न पढता मैं तहरीर इसकी ,
तेरा चेहरा खुली किताब लगता है ,

रुक जाए ये पलकों पे तो अच्छा ,
अश्क बह जाए तो सैलाब लगता है ,

तुझे एहसास नहीं नाज़ुक लबों का ,
ये सुर्ख खिलता गुलाब लगता है ,

तेरी चाहत का असर है क्या करें ,
हमें रकीब भी अहबाब लगता है ,

मेरी कुर्बत में आजा उम्र भर को ,
ये फासला मुझको अज़ाब लगता है ,

तन्हाई में भी तेरी सदा आती है ,
तू हमेशा मुझे दस्तयाब लगता है ,

अदनी सी कोशिश अदब की बस्ती में ,
मुकम्मल नहीं पर कामयाब लगता है ,

रात को चैन न दिन को सुकून ,
दीवाना मुझे ये “शादाब” लगता है !!

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