एक ज़ख्म नया हर बार देता है….

एक ज़ख्म नया हर बार देता है ,
जब फूल के साथ वो ख्वार देता है ,

पेट ज़ालिम है कह कर शिकारी ,
रोज़ कितने परिंदे मार देता है ,

आसानियाँ तो हैं जिंदगी जीने में ,
मौत जब भी दे दुशवार देता है ,

खुशी दोबाला हो जाती है जब ,
फल दरख़्त-ए-सायादार देता है ,

उस दर्द का मज़ा अलग है “शादाब” ,
दिल लेकर जो दिलदार देता है !!

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