आवाज़ देकर हम बुलाया नहीं करते….

आईना सूरज को दिखाया नहीं करते ,
अहसास-ए-ईश्क बताया नहीं करते ,

जिन्हें करीब आना हो वो खुद आते हैं ,
आवाज़ देकर हम बुलाया नहीं करते ,

साहिल पे लुट जाती हैं कश्तियाँ सब ,
हम रेत पर घर बनाया नहीं करते ,

देखते हैं जो सही मंजर दिखाई दे ,
बेसबब नज़रों को फिराया नहीं करते ,

चाँद की तरह दागदार है चेहरा भी ,
हम अपनी गलतियाँ छुपाया नहीं करते ,

राही को सही मंजिल का पता देते हैं ,
भटके हुए को और भटकाया नहीं करते ,

अजीब था लहज़ा के खुद उसने कहा ,
वख्त के मारे को सताया नहीं करते ,

कुछ ईस तरह टूटा है नींद से रिश्ता ,
ख्वाब आँखों में अब आया नहीं करते ,

लबों पे “शादाब” उसने उँगलियाँ रक्खी ,
कहा अलफ़ाज़ को नुमाया नहीं करते !!

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