चाँद चिलमन से यूँ निकल रहा है….

चाँद चिलमन से यूँ निकल रहा है ,
जैसे चराग कोई बाम पे जल रहा है ,

इसे इत्तेफाक कहें या मुहब्बत कहें ,
अन्धेरा रौशनी के साथ चल रहा है ,

तेरा हुस्न है या आफताब की किरन ,
ये दिल मेरा मोम सा पिघल रहा है ,

इन फिजाओं से क्या कह दिया तुने ,
मौसम भी धीरे धीरे बदल रहा है ,

ईक मुददत हुई “शादाब” बिछड़े मगर ,
ख्वाब-ए-वस्ल आँखों में पल रहा है !!

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