अजीब कशमकश में हूँ मैं…

सुलझ कर भी , उलझ जाती हूँ मैं…
ख़ुद को ही समझते हुए भी,
ख़ुद को ही समझाती हूँ मैं….
नाराज़ भी ख़ुद से कब तक रहूँ..
अपने आप को मना कर ,
 आईने से रूठ जाती हूँ मैं…
                                         kajal sky……

2 Comments

  1. Rahul Nishad 17/05/2013
  2. Dharitri Dharitri 22/09/2016

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