कैसे कह दूँ गिर कर संभलना नहीं आता……

नफरत की आग में मुझे जलना नहीं आता ,
मर्द-ऐ-मुजाहिद हूँ रास्ता बदलना नहीं आता ,

काँटों के साथ गुज़ारी है जिंदगी मैंने ,
मुझे नाज़ुक फूलों को मसलना नहीं आता ,

तुझे शौक़ है तो तेरी मर्ज़ी तू ही चल ,
मुझे ईस राह-ऐ-जफा पे चलना नहीं आता ,

हज़ार ठोकरें लगी फिर भी खड़ा हूँ “शादाब” ,
कैसे कह दूँ गिर कर संभलना नहीं आता !!

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