अफ़सोस नीलाम हो रहा है चमन मेरा….

आज सर पे मैंने बांधा है कफ़न मेरा ,
खून-ए-जिगर में नहाया है पैरहन मेरा ,

कहाँ हैं वो दीवाने आजादी के परवाने ,
कोई बचा लो बर्बाद हो रहा है वतन मेरा ,

दुश्मनों के घर बजती हैं शहनाइयां अब,
अफ़सोस नीलाम हो रहा है चमन मेरा ,

कहने को तो ठण्ड है फिजाओं में “शादाब” ,
पर सहराओं में जल रहा है बदन मेरा !!

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