शिकवा कहाँ अब शिकायत कहाँ रही….

शिकवा कहाँ अब शिकायत कहाँ रही ,
पहले जैसे हुस्न में इनायत कहाँ रही ,

दिल के बदले जो दिल देने का चलन था ,
अब भूल जाओ के वो रिवायत कहाँ रही ,

अश्कों ने भी छोड़ दिया है अब तन्हा ,
आँखों के साथ इन्हें हिमायत कहाँ रही ,

ईस दौर में हम भूल गए अपना भी चलन ,
बुजुर्गों ने जो दी थी वो हिदायत कहाँ रही !!

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