हर आईने में तुझको अक्सर संवरते देखा….

हर एक ख्वाब को टूट कर बिखरते देखा ,
हमने ख्वाहिशों को तिल तिल कर मरते देखा ,

इतनी हिम्मत तो नहीं थी के रो सकूँ मैं ,
अपनी आँखों से मगर उसको बिछड़ते देखा ,

सदियाँ गुजर जाती हैं एक बस्ती बसाने में ,
दिल की बस्ती को मगर लम्हों में उजड़ते देखा ,

हसरत ही रही इन हाथों से छूने की मगर ,
हर आईने में तुझको अक्सर संवरते देखा !!

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