साया-ऐ-दिवार लेते आना……..

घर लौट के जब आओ बहार लेते आना ,
थोड़ा ही सही मेरे लिए प्यार लेते आना ,

तपते सहरा में है जलता हुआ मकाँ मेरा ,
आँगन को ढके वो साया-ऐ-दिवार लेते आना ,

साहिल पे खड़े कश्तियों से कहा उसने ,
मिल जाए जो सर-ए-राह अंसार लेते आना ,

इन नम हुए खिज़ाओं से दिल भर गया मेरा ,
तुझे पसन्द जो मौसम-ऐ-खुशगवार लेते आना ,

तारीकियों से हो गई है अब नफरत बहुत ,
मेरे लिए कोई चराग-ए-अनवार लेते आना !!

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