जब तक नाम न हो कोई बदनाम नहीं होता….

आगाज़ तो होता है मगर अंजाम नहीं होता ,
साकी तेरी बज़्म में कोई गुमनाम नहीं होता ,

शोहरत-ए-शज़र की शाख कमज़ोर है बहुत ,
जब तक नाम न हो कोई बदनाम नहीं होता ,

ठोकर लगी तो मुकद्दर से शिकायत क्यूँ करें ,
जो गिर के संभल जाए वो नाकाम नहीं होता ,

सफर तवील है मगर चलता रहूँगा हमेशा ,
मंजिल न पा लूँ मैं जब तक आराम नहीं होता ,

इशारों में ही मिल जाता है जवाब-ए-कलाम मुझे ,
ये और बात है मुंह से कभी सलाम नहीं होता ,

अगर तोड़ देता मैं अहद-ए-वफा भी जूनून में ,
महबूब के नज़र में अपना कोई मकाम नहीं होता ,

मुहब्बत के भी कुछ उसूल हुआ करते हैं “शादाब” ,
सिर्फ लफ़्ज़ों से ही अदा इसका अहकाम नहीं होता ,

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