अच्छा हुआ गुनाह-ए-जिंदगी नजात आ गई….

दर्द और भी बढ़ गया जब रात आ गई ,
तुने कही थी जो याद वो बात आ गई ,

मौसम तो आ गया है खिजाओं का मगर ,
मेरी आँखों में क्यूँ आज बरसात आ गई ,

सबा आई तेरे कुचे से मगर तन्हा नहीं ,
साथ वो लिए तेरे यादों की बारात आ गई ,

कज़ा आई है तो इसमें गम कैसा करना ,
अच्छा हुआ गुनाह-ए-जिंदगी नजात आ गई ,

मय्यत पे भी आये वो तो मुस्कुराते हुए ,
मेरी रूह तक को आज निशात आ गई ,

दर-ए-मुस्तुफा (स.अ.व) मिला जो चूमने को ,
यूँ लगा मेरे हाथ सारी कायनात आ गई ,

ईससे बड़ा इनाम-ए-इश्क क्या होगा “शादाब”
जो वो हाथों में लेकर अपने गुलाब आ गई !!

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