तू नज़रें झुका ले तो और संवर जायेगा……

जनाब अहमद फराज़ साहब के एक गज़ल का मिसरा है -: “”तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा”” ईस मिसरे पर मेरी एक छोटी सी कोशीश -;

उदास रह कर जिएगा तो बिखर जाएगा ,
मुस्कुरा देगा तो चेहरा निखर जाएगा ,

उसके आने पे खुशी उसके जाने पे आँसूं ,
ईस क़दर हस्सास हो कर तो तू मर जाएगा ,

आँखें बंद कर के तो देख एक बार कभी ,
ख़्वाबों में भी हसीन मंज़र नज़र आएगा ,

दिल के दरवाज़े खुलते हैं एक ही बार ,
कोई आ जाए जो इधर फिर किधर जाएगा ,

आईना सच ही कहता है ये हकीकत है ,
“तू कभी खुद को भी देखेगा तो डर जाएगा” ,

हया ही तेरा हुस्न-ए-कमाल होगा अगर ,
तू नज़रें झुका ले तो और संवर जायेगा ,

सफर तो मुहब्बत का शुरू हो चुका “शादाब” ,
देखना है उसके घर कौन सा डगर जायेगा !!

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