बुला लीजिए एक बार पूरी उम्मत को मदीना….

हो अस्सलात-ओ-वस्सलाम या ताजदार-ए-मदीना ,
मेरी किस्मत में भी थी जो देख आया मदीना ,

या सरकार-ए-दो आलम या करार-ओ-कल्ब-ओ-सीना ,
खड़ा हूँ मैं समन्दर में बचा दो मेरा सफीना ,

एक बार फिर बुला लो के एक ही हसरत है बाकी ,
वोहीं है मुझको मरना वोहीं है मुझको जीना ,

मिल जाए जो हमें खाक-ए-नक्श-ए-पाए अहमद ,
क्या करूँगा मैं ले कर ईस जमाने का खजीना ,

या सल्ले अला कहो दरूद-ओ-पाक खूब पढ़ो ,
के आ गया हमारे आका के रहमतों का महीना ,

कीजिये करम की बारीश ऐसी दुआ है शादाब की ,
बुला लीजिए एक बार पूरी उम्मत को मदीना !!

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