निश्चेष्ट पड़ा मेरा शरीर

निश्चेष्ट पड़ा मेरा शरीर,
सुषुप्त-सी आँखें देखती हैं
रोशनी में हरकत करते
दीवार पर कुछ कीड़े।

कुछ स्पन्दन होता है शरीर में,
होंठ हिलते हैं, कुछ शब्द बोलते हैं
स्पष्ट-अस्पष्ट…

हाथ भी हिल रहा है आहिस्ता-आहिस्ता,
कुछ सिहरन होती है, पैरों में भी,

शायद उम्मीद अभी बाक़ी है
मोहल्ले की गलियों में पतंग के पीछे दौड़ने की
या फिर अपने गन्दे हाथों को
माँ के आँचल में पोंछने पर
प्यार से झिड़कते हुए देखने की
माँ की उस हँसी को ।

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  1. Chirag Raja 05/08/2015

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