मैं हिस्सा हूँ तेरे हुस्न-ए-बाजार का….

वख्त ढूंढता है वो लम्हा बहार का ,
कुछ उम्मीद बाकी है एतबार का ,

कितना तड़पे हैं तुझे क्या मालूम ,
कोई सिला तो दे मेरे इन्तेजार का ,

बहुत बेचैनी है दिन रात नहीं गुजरते ,
ढल क्यूँ नहीं जाता वख्त खुमार का ,

नामुमकीन है तेरा मुझसे यूँ दूर जाना ,
मैं हिस्सा हूँ तेरे हुस्न-ए-बाजार का !!

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