ख्वाब तो ख्वाब हैं अक्सर टूट जाते हैं……

चरागों की तरह रोज़ जलना पड़ा मुझे ,
बेसाख्ता काँटों पे भी चलना पड़ा मुझे ,

मंजील करीब थी मगर सफर तवील ,
ये सोच कर रास्ता बदलना पड़ा मुझे ,

ख्वाब तो ख्वाब हैं अक्सर टूट जाते हैं ,
नींद के बाद हकीकत में ढलना पड़ा मुझे ,

जब वख्त-ए-वस्ल गुजर गया हमारा तो ,
अफसोस से फिर हाथ मलना पड़ा मुझे !!

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