कैसा लगता है शमा बन कर चरागाँ होना….

बेफिक्र हो कर भी तेरा यूँ परेशां होना ,
हैरां हूँ मैं देख कर तेरा यूँ हैरां होना ,

रात आंधीयों से बात ये मालुम हुई मुझे ,
कैसा लगता है शमा बन कर चरागाँ होना ,

जुदाई तो थी मगर अब तो मिल चुके ,
क्या जायज़ है यूँ तेरा महर-ए-ताबां होना

खुशी पर खामोशी ग़मों पर कहकहे हैं ,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना !

बुलंदियों पे अहसास नहीं होता जमीन का ,
निचे आकर देख जरा गर्दीश-ए-दौरां होना ,

दूर रहने वाला आज गले लग गया “शादाब” ,
मैं समझा नहीं उसका यूँ मेहरबां होना !!

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