तेरी आँखें भी एक अजब सवाल करती हैं…….

इज़हार-ए-ख्याल हसरतों का भी मलाल करती हैं ,
ये तेरी आँखें भी एक अजब सवाल करती हैं ,

ग़म-ए-तकलीफ़ से ही नींद नहीं ज़ाया होती ,
कभी कभी चाहत भी जीना मुहाल करती है ,

बिछड़ न जाएँ हम जिंदगी के सफ़र में कहीं ,
वो न जाने क्यूँ कर ऐसा ख़याल करती है ,

उसके रुखसार को सज़ा लूँ हाथों पे ”शादाब” ,
मेरी सोच भी क्यूँ कर ऐसा मज़ाल करती है !!

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