जमाना उल्टा है (कलयुगी दोहे)

रहिमन जमाना उल्टा है, मांगे मिले ना भीख।

बिन मांगे नोट मिले, चमचागिरी तो सीख ॥

रहिमन राशन राखिये, बिन राशन सब सून ।

जनवरी की चीनी मिले, जब बीत जाये जून ॥

रहिमन जनसंख्या यों बढे, ज्यों द्रोपदी का चीर ।

एक-एक सेनापति के, हिस्से आते दस-दस वीर ॥

कबीरा जुआ ऐसी बला, जो खेले सो कंगाल ।

जूते पङे सर पे तो, बचे न एक ही बाल ॥

चलती ट्यूशनखोरी देख कबीरा दिया रोय ।

इस ब्रह्मास्त्र के बिना पास हुआ न कोई ॥

कबीरा देख स्टूडेन्ट की, बदल गई है जात ।

गुटखा बीङी सिनेमा के पीछे, पढाई को मारी लात ॥

चलती रिश्वतखोरी देख, कबीरा दिया रोय ।

इस काजल की कोठरी में, उजला रहा ना कोय ॥

-“गोपी” 

 

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