दीपमाला

चहुंदिश फैला है उजाला

एक बार फिर सजी है दीपमाला

एक ही माटी ने हमें है पाला

इसी मातृभूमि ने हमें सम्भाला

नहीं भेद रंग का गौरा या काला

हम सब हैं फूलों की एक माला

एक-दूजे से अपना रिश्ता है निराला

‘विश्व बन्धुत्व’ से फैलेगा जग में उजाला

न छीने कोई किसी और का निवाला

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ चाहे गोपाला

-“गोपी”

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