करोड़ोँ झूठ बोलेँ हम,

करोड़ोँ झूठ बोलेँ हम, पर उनको सच्चे लगते हैँ।
मगर ये प्रीत के धागे हमेँ क्यूँ कच्चे लगते हैँ।
ये दोष नज़रोँ का है उनकी या हमारी खूबी।
जिसे कोई नहीँ जचता, उन्हेँ हम अच्छे लगते हैँ।।

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  1. sandeep chauhan 19/10/2012

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