तेरा दीद-ए-नज़र भी खूब तमाशाई है……..

पैगाम मुहब्बत के वो ले कर आई है ,
एक खुशबु सी इन फिजाओं में छाई है ,

देखता है तू चमन में फूल भी कांटे भी ,
तेरा दीद-ए-नज़र भी खूब तमाशाई है ,

इज़हार-ए-ईश्क-ओ- ईकरार फिर इनकार ,
ये दिल की लगी है कोई या दिल लगाई है ,

चिंगारी इधर भी है और धुंआ उधर भी है ,
वीरान-ए-बस्ती में ये आग किसने लगाई है ,

सच है के तन्हा हूँ आंसुओं की बारीश में ,
मगर ये बात उस को किस ने बताई है ,

बड़े सलीके से लगा रक्खे हैं इनमें फूल तुने ,
ईस कदर तेरी ज़ुल्फ़ किसने सुलझाई है !!

Leave a Reply