तू और भी याद आता है जब भुलाना चाहता हूँ……..

मुहब्बत क्या है ज़माने को बताना चाहता हूँ ,
मगर दिल के ज़ख्म सबसे छुपाना चाहता हूँ ,

बस चाँद ही नहीं मशहूर ज़माने में खुबसूरत ,
मैं तेरा चेहरा भी लोगों को दिखाना चाहता हूँ ,

जानते हुए के मौज-ए-समंदर की ज़द में होगा ,
मैं फिर भी ईस रेत पे घर बनाना चाहता हूँ ,

मुझे मालूम है तू राह-ए-वफा पे नहीं गुज़रता ,
क़दमों में फिर भी तेरे फूल बिछाना चाहता हूँ ,

मेरी रूह से वाबस्ता हो गईं तेरी यादे अब ,
तू और भी याद आता है जब भुलाना चाहता हूँ ,

बड़े नाज़ुक नाज़ुक हैं ये फूल जैसे हाथ तेरे ,
इन्हें सहराओं की धुप से बचाना चाहता हूँ ,

अपने लिए तो ग़म ज़दा हूँ मैं मगर ,
किसी और के खातिर मुस्कुराना चाहता हूँ ,

तेरी नर्म नर्म जुल्फों के साए में बैठ कर ,
मैं अपना फ़िक्र-ओ-फन आज़माना चाहता हूँ !!

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