क्या रक्खा है तेरे शहर में के लौट आऊँ मैं….

क्या रक्खा है तेरे शहर में के लौट आऊँ मैं ,
अब उतनी हिम्मत नहीं के दुबारा चोट खाऊं मैं ,

इतनी तकलीफ़ में जीने से तो मर जाना बेहतर ,
के सबके सामने बार बार कैसे मुस्कुराऊं मैं !!

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