!! मेरी चुनी राह !!

जिसे समझते थे हम अपनी जिंदगी , आज पता चला वो एक गलती थी !

जिस भरोसे की ऊँगली थाम चल परे थे हम मुसाफिर बन कर, 
आज पता चला मेरी वो चुनी हुई राह ही गलत थी !!

चलते चलते आ चुके थे उस मोड़ पर, 
जहा से मंजिल पाना मुश्किल और वापस आना था नामुमकिन !! 
बिच राह खरे खरे बस देखते रहे अपने चुने हुए डगर को !

समझ न आया कोसूं किसे, मंजिल को या हमसफ़र को !!
फिर तनहाइयों के बादल ने जब अपने आगोश में लिया,
सांस के डोरों ने साथ देने से जब मुंह फेर लिया !

फिर पता चला मेरी वो चुनी हुई राह ही गलत थी !! 

One Response

  1. Jitendra Jha 24/09/2012

Leave a Reply