अब लैला और कैस के ईश्क का ज़माना नहीं है

बताना नहीं है अब उसको समझाना नहीं है ,
मुझे अपना इलाज-ए-गम करवाना नहीं है ,

तुम ये क्या सच्ची मुहब्बत की रट लगाए हो ,
अब लैला और कैस के ईश्क का ज़माना नहीं है ,

ये सच है के दिल टूट जाता है हर आशीक का ,
बन जाए जो ताज महल ये वो फसाना नहीं है ,

मन्द हो गए है उसके अंदाज़-ए-तीर भी सारे ,
वार तो है हुस्न का मगर कातिलाना नहीं है ,

तुम उम्मीद-ए-वफ़ा मत करना अब उस से ,
वो पागल है नासमझ है मगर दीवाना नहीं है ,

वो तो गए जो हुस्न-ए-अदा का जाम पिलाते थे ,
उनकी तो गली में भी अब कोई मयखाना नहीं है ,

उसके लहजे से छलकती है नरमी कभी कभी ,
लगता है अंदाज उसका अब हरीफाना नहीं है !!

उसने ‘शादाब’ को कभी पास बुलाया ही नहीं ,
अब मैं कहाँ जाऊं मेरा कोई ठीकाना नहीं है !!

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