जलाओ न चराग़ कोई अभी अँधेरा रहने दो………

ईस जुर्म-ए-मुहब्बत की सज़ा हमें सहने दो ,
जलाओ न चराग़ कोई अभी अँधेरा रहने दो ,

तुम दास्तान-ए-इश्क़ न सुनना चाहो न सही ,
पर जो बात हलक में अटकी है उसे कहने दो ,

इसको रोक पाना अब मुश्किल सा लगता है ,
झपकाने दो पलकें इन आंसुओं को बहने दो ,

खता किसकी जुर्म किसका किसने सज़ा दी किसको ,
मुझे किसी से गिला नहीं ये ग़म अकेले सहने दो !!

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